स्तोत्र 1(ख)
ओ, सुखी वही है ( 2 )
जो दुष्टों का संग न करता, सुखी वही है,
जो न कभी उपदेश मानता
कुटिल पुरुष का या दुरजन का
और न करता पंथ ग्रहण वो
पाप मलिन या कलमष तन का ,ओ…..
1. सदा विश्व विभु के नियमों में
पाता परमानन्द वही है
और जपा करता नियमों को
जो निशि-दिन निरद्वंद्व वही है ।
2. मनहर तरुवर तुल्य खड़ा जो
जलधारा के कूल वही है
प्रति ऋतु फलित हरित हो शाश्वत
सफल कर्म का मूल वही है
किंतु न मिलता दुरज़न को फल
कभी न मिलता धूल वही है ।
3. नहीं नहीं वो भुस का तृण है
जिसको पवन उड़ा डालेगा
कभी न्याय पर ऐसा पापी
पल भर भी क्या टिक पायेगा ।
धर्मनिष्ठो की यह दुनिया है
यहाँ कुटिल क्या रह पायेगा ।
4. धर्म ग्रंथ की रक्षा करते स्वयं विश्वपति
स्वयं जनेश्वर, किंतु पतित पुरुषों का पथ है
पूर्ण तमोमय अंधकार भर ।
Song Link –
New Song (Naya Gaan) Page no. 48,
Hymn no. 1 (ख).
Hymn Book – (Naya Gaan)Sangeet Sagar
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